This poem is inspired by an episode of mahabharat that i saw on youtube last weekend, and a poem 'krishna ki chetawani' by Ramdhari singh dinkar. It portraits the scene of duryodhan's defeat by Bheema when he was hit below waist. Balraam ran to kill Bheema on seeing this, but Krishma came in the middle and tried to cool him down :). Anyway, please leave some feedback. Thank you.
तम का बढ़ता संधान हुआ
हलधर के हल की चाप देख
वसु का जीवन निष्प्राण हुआ
जल-अनल एक सब जान पड़े
पांचो के कम्पित प्राण पड़े
सरवर का जल, जल जाता था
धरिनीधर की हुंकार तले
वायु की डगमग चाल हुई
वसु भय की ग्रास अकाल हुई
जन-जीवन भय से काँप उठा
जीवन प्रवाह थम शांत हुआ
पवनों की दिश डग-डोल उठी
भूपति की जिह्वा बोल उठी
हे शक्ति पुंज, हे तात मेरे
हम वचनों भर के दास तेरे
तेरे हल ने मृत्यु बांटा
जो बचा रहा, उसका घाटा
जो तेरी बलि चढ़ जाना हो
जीवन सहस्त्र बिखराना हो
कुछ मेरी भी तो आस सुनो
तुम रुको तात ये बात सुनो
जो पड़ा हुआ, ले अंग भंग
बैरी जग का ये दुर्योधन
ये दुष्कर्मों का साथी है
ये बड़ा अभागा पापी है
इसके अभीष्ट को साध रहे
तुम मर्यादा को मार रहे
अन्धक का ये उजियारा था
इसने हर धर्म को मारा था
सत्रह दिन का ये सर्वनाश
शकुनी की तृष्णा की ये प्यास
धरती पे आज अकाल हुआ
वीरो से मुक्त ये काल हुआ
क्यों बीच युद्ध मे आते हो
अपनी हुंकार दिखाते हो
तुम कहाँ गए जब ध्युत हुआ
थे कहाँ हुआ जब लाक्षाग्रह
ये न्याय नहीं, ये धर्म नहीं
रणभूमि है महाभारत की
ये नयी कोई परिभाषा है
अब यहीं धर्म की आसा है
ये शिष्य तेरा होगा दाऊ
क्यों इसपे ममता दिखलाऊं
इस अन्धक को मिट जाने दो
कर्मों का फल इसको पाने दो
-मारुती अग्रवाल